जब कुलदीप कुमार वेदवान ने तीरंदाज़ी के लिए छोड़ दी थी भारतीय सेना, जानें परिवार की क्या थी प्रतिक्रिया

kuldeep kumar vedwan

कुलदीप कुमार वेदवान एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने अपने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा है। कुलदीप को सेना में नौकरी करने का अवसर मिला और वे अपने परिवार से पहले व्यक्ति थे जो कि भारतीय सेना में भर्ती हुए था, लेकिन तीरंदाज़ी में रुचि होने के कारण कुलदीप ने सेना से रिटायरमेंट ले ली थी। फिलहाल कुलदीप साल 2017 से कटरा स्थित माता वैष्षों देवी श्राईन बोर्ड ट्रस्ट द्वारा बनाए गए स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स में कई खिलाड़ियों को तीरंदाज़ी के गुण सिखाते हैं।  इन दिनों कुलदीप कुमार महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित भारतीय खेल प्रधिकरण में पैरा तीरंदाज़ खिलाड़ियों को कोचिंग दे रहे हैं जो कि अगले महीने होने वाले पैरा एशियन खेलों में देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। कुलदीप जी ने स्पोर्ट्सग्रेनी को दिए इंटरव्यू में कई खास बातें हमसे साझा की।कुलदीप के साथ हुई बातचीत के कुछ अंश:

सवाल 1. कुलदीप जी सबसे पहले तो आप अपने बारे में बताएं और तीरंदाज़ी में आपकी रुचि कैसे बनी?
जवाब. “मैं उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के धनोरा का रहने वाला हूं। साल 2000 में मैं भारतीय सेना में शामिल हुआ था। सेना की ट्रेनिंग खत्म होने के बाद भारतीय सेना में रहते हुए ही मैंने तीरंदाज़ी ज्वाइन किया। यह खेल खेलने के बाद मुझे बहुत अच्छा महसूस हुआ। इससे पहले मैं बॉक्सिंग और हैंडबोल जैसे कई अन्य खेल भी खेला करता था, लेकिन मेरे सीनियर्स ने मुझे तीरंदाज़ी के लिए प्रोत्साहित किया कि मुझे तीरंदाज़ी खेलना चाहिए। अपने सीनियर्स की बात मानते हुए मैंने तीरंदाज़ी खेलना शुरु कर दिया और उसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।”

सवाल 2. 14 साल तक आपने भारतीय सेना में रहते हुए सेवा दी, जिसके बाद अपना करियर तीरंदाज़ी में बनाने के लिए सेना से रिटारमेंट ले लिया। इस पर क्या कहना चाहेंगे?
जवाब. “जब मैंने सेना में रहते हुए तीरंदाज़ी खेलना शुरू किया, तब मेरे कमांडिंग ऑफिसर कर्नल मोहन ने मेरी यूनिट से मुझे फ्री किया और दूसरी यूनिट में जाकर तीरंदाज़ी सीखने के लिए कहा। उन्होंने मुझसे कहा था कि कुलदीप मैं आपको यहां से रिलीज़ कर रहा हूं ताकि आप अपने लिए और यूनिट के लिए तीरंदाज़ी सीखो और देश के लिए कुछ अच्छा करो। उनकी बात को मैंने ध्यानपूर्वक सुना और समझा कि ये एक नया खेल है, जिसमें मैं अच्छा प्रदर्शन कर सकता हूं।”

सवाल 3. भारतीय सेना छोड़कर तीरंदाज़ी सीखने की बात जब आपने परिवार को बताई तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी?
जवाब. “यह बात जब मैंने अपने परिवार को बताई तो उनकी बहुत ही सकारात्मक प्रतिक्रिया थी। उन्होंने मुझसे कहा कि जिस खेल या काम में आपकी रुचि है वह कार्य आप कर सकते हो, हमें कोई परेशानी नहीं है। मेरे लिए जितना मेरे बड़े भाई-भाभी ने किया है, मुझे नहीं लगता उतना कभी कोई किसी के लिए कर सकता है। मेरे बड़े भाई मेरे पिता के समान हैं। मैं काफी छोटा था जब मेरी माता जी का निधन हो गया। मेरी बड़ी भाभी ने ही मेरी परवरिश की है। मेरे दोनों बड़े भाइयों ने मुझे हमेशा अपने बच्चे की तरह लाड़-प्यार दिया। मैं जब सेना में था तब उन्होंने कभी मुझसे नहीं कहा कि तुम अपनी सैलरी हमें दो या हमारे लिए ये काम करो। उन्होंने मुझसे कहा कि आप अपनी जिंदगी में जो करना चाहते हो वो करो, आपको हमारा पूरा समर्थन है।”

सवाल 4. आप 15 साल तीरंदाज़ी को दे चुके हैं। इस दौरान आपने किन परेशानियों का सामना किया?
जवाब. “मैं जब एक खिलाड़ी हुआ करता था तो मेरे सामने कई समस्याएं आईं। हमारे पास केवल हमारी सैलरी होती थी, जिसे हमें अपने खेल और अपने रहन-सहन के लिए इस्तेमाल करना होता था। उस समय ऐसी कोई सुविधा नहीं थी, जिसमें कि हम खेल के लिए किसी संस्थान से जुड़ सकें या कोई संस्थान हमें अपने साथ जोड़ सके। उस समय एक कमान यानी धनुष करीब ढाई हजार रुपए का आता था और उसे खरीदने के लिए हमें काफी सोचना पड़ता था क्योंकि जितनी सैलरी मिलती थी उतने में कमान और तीर लेना बहुत मुश्किल होता था।”

“हालांकि इस समय खिलाड़ियों को इस प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ रहा है। जो अच्छे खिलाड़ी हैं उन्हें सरकार के द्वारा अच्छी सुविधाएं दी जा रही हैं। इसके पीछे वजह है खेल मंत्रालय और केन्द्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ द्वारा पिछले साल चलाई गई नई स्कीम खेलो इंडिया, जिसमें गांव-गांव जाकर स्कूल और कॉलेज लेवल से बच्चों को चुना जाता है और खेलो इंडिया स्कीम के माध्यम से उन्हें सारी सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं जो हमारे समय पर नहीं थी।”

सवाल 5. आपके हिसाब से जमीनी स्तर पर खिलाड़ियों को जो सुविधाएं मिलनी चाहिए क्या सरकार वो दे पा रही या नहीं?
जवाब. “माननीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ जी द्वारा पिछले साल शुरु किया गया खेलो इंडिया प्रोग्राम एक बहुत ही सराहनीय कदम है। इस स्कीम के जरिए हर साल हजार बच्चों को खेलों के लिए चुना जाएगा और उन्हें पांच-पांच लाख रुपए की स्कॉलरशिप दी जाएगी। इसके पीछे का उद्देश्य है कि हमारे देश के बच्चे खेलों में अच्छा प्रदर्शन करें और 2028 में होने वाले ओलम्पिक्स में भारत के लिए ज्यादा से ज्यादा पदक लाकर देश का नाम रोशन करें।”

सवाल 6. जब भारतीय खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय खेलों में मेडल जीतकर आते हैं तो सरकार द्वारा उन्हें काफी अच्छी राशी इनाम में देती है। क्या आपको लगता है कि सरकार जो राशी खिलाड़ियों को मेडल जीतने के बाद देती है, अगर वह राशी खिलाड़ियों को उस समय दी जाए जब उन्हें खेलों के लिए जरुरत होती है तो खिलाड़ी ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं?
जवाब. “सरकार द्वारा खिलाड़ियों को जो राशी जीतने पर दी जाती है वह बहुत ही सराहनीय कदम है। अगर यह राशी खिलाड़ियों को उनके जीतने से पहले उनके अच्छे खेल उपकरणों या खिलाड़ियों की अन्य सुविधाओं के लिए उनकी संस्था को दी जाए तो वे और भी अच्छा प्रदर्शन करके दिखा सकते हैं। जमीनी स्तर पर ये सुविधाएं खिलाड़ियों को दी जाएं तो वह दिन दूर नहीं जब ओलम्पिक्स में बहुत सारे मेडल आएंगे।”

सवाल 7. क्या आपको लगता है कि सरकार को खेल नीति में बदलाव या सुधार लाने की जरुरत है?
जवाब. “मैं इसमें सरकार की गलती नहीं मानता क्योंकि सरकार हमें वो हर सुविधा देती है जिसकी हमें जरुरत है। सरकार एक खेल कैंप में 50 से 60 लाख रुपए खर्चा करती है, जिसमें हर प्रकार की सुविधाएं हमें मुहैया कराई जाती हैं। मुझे लगता है कि हम कोच और खिलाड़ियों को थोड़ा ज्यादा एक्टिव होने की जरुरत है। अभी सरकार काफी अच्छी स्कीम लेकर आई हैं ताकि खिलाड़ी हर सुविधा प्राप्त कर सके लेकिन हमें भी मेहनत करनी होगी।”

सवाल 8. पैरा एशियाड 2018 के बारे में बताएं कि आपके कितने खिलाड़ी जा रहे हैं और आपकी कैसी तैयारी है?
जवाब. “पैरा एशियन खेलों में तीरंदाज़ी के लिए भारत से 7 खिलाड़ी जा रहे हैं, जिनमें चार कम्पाउंड कैटगरी के हैं और 3 रिकर्व कैटेगरी से हैं। कम्पाउंड तीरंदाज़ी में 50 मीटर की दूरी पर निशाना लगाना होता है। इस कैटेगरी में दो लड़कियां हैं और दो लड़के हैं। इन खेलों के लिए हमारी काफी अच्छी तैयारी है।”

सवाल 9. इन सात खिलाड़ियों में से दो खिलाड़ी ज्योति बालियान और राकेश ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने शुरु से आपके पास ट्रेनिंग ली है, उनके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?
जवाब. “ज्योति को मैं तबसे ही कोचिंग दे रहा हूं जब मैंने साल 2008 में अपने बागपत जिले में अपनी तीरंदाज़ी अकेडमी शुरू की थी। ज्योति राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक जीत चुकी हैं। वहीं राकेश जम्मू के रहने वाले हैं। राकेश के बारे में एक स्थानीय व्यक्ति के द्वारा मुझे पता चला था। राकेश की जिंदगी से जुड़ी एक घटना मैं आपके साथ साझा करना चाहता हूं। राकेश एक दिन जब गाड़ी से कहीं जा रहे थे तो उनकी गाड़ी का एक्सिडेंट हो गया था। इस हादसे में 5 लोगों की मौत हो गई और बस राकेश और उनके एक साथी ही जीवित बचे थे। उसके अंदर कुछ करने की इच्छा खत्म हो चुकी थी। राकेश को मैं स्टेडियम लेकर आया और उसे ट्रेनिंग देना शुरू किया और बीस दिन में ही उसे एक प्रतियोगिता में उतार दिया। वहां उसका प्रदर्शन कुछ खास नहीं था क्योंकि बीस दिन में कोई तीरंदाज़ी खेलना नहीं सीख जाता है, लेकिन यहां खेलकर उसके अंदर खेलने की इच्छा जगी। उसने मुझे बताया था कि हादसे के बाद उसने तीन बार खुदकुशी करने की कोशिश की थी लेकिन अब उसे जीने की चाह मिल गई है और बस एक ही साल में राकेश का तीरंदाजी में बहुत ही अच्छा प्रदर्शन है।”

राकेश कुमार और ज्योति बालियान

सवाल 10. देश में क्रिकेट के ज्यादा प्रशंसक हैं और मीडिया कवरेज की बात की जाए तो अन्य खेलों के मुकाबले क्रिकेट को ज्यादा कवरेज मिलता है, इस पर क्या कहेंगे?
जवाब. “हमारे देश में इस समय क्रिकेट बहुत ही प्रसिद्ध हो चुका है, लोग काफी पुराने समय से क्रिकेट देखते आ रहे हैं, जिसके कारण आज क्रिकेट के बहुत से प्रशंसक हैं। क्रिकेट को मीडिया का बहुत कवरेज मिलता है। अगर रणजी क्रिकेट भी होता है तो कई न्यूज चैनल्स उसे जोर-शोर से दिखाते हैं लेकिन ऐसा अन्य खेलों के लिए नहीं है। सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय इवेंट ओलम्पिक को भी केवल एक चैनल पर दिखा दिया जाता है।”

“अभी हाल ही में हुए एशियन खेलों की बात करें तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि जब मैं एथलीट्स को प्रैक्टिस करवाकर वापस आता था, तो मैं एशियन खेल देखने का मन करता था। मुझे नहीं पता था कि टीवी पर कौनसे चैनल पर एशियन खेलों को कवर किया जा रहा है। मैंने जब एशियन खेल देखने के लिए सर्च किया तो पाया कि केवल दो चैनल्स पर एशियन खेलों को दिखाया जा रहा था जबकि अन्य सात-आठ चैनल पर केवल क्रिकेट चल रहा था। मुझे क्रिकेट बहुत पसंद है और हमारे क्रिकेटर्स बहुत अच्छा खेलते हैं लेकिन जितना क्रिकेट को कवरेज दिया जात है, अगर उतना ही कवरेज अन्य खेलों को मिले तो खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करेंगे और उन्हें स्पोन्सरशिप भी मिल सकती है। उदाहरण के तौर पर प्रो कबड्डी को ही ले लीजिए, जिसमें कई टीम को बड़े-बड़े स्टार्स ने खरीदा हुआ है और अब कबड्डी लीग बहुत प्रसिद्ध हो चुका है।”

“वहीं, अभी हम पैरा वर्ल्ड आर्चरी रैंकिंग इवेंट के लिए यूरोप गए थे। यह देश के लिए एक ऐतिहासिक बात थी। इस इवेंट में पहली बार पैरा आर्चर देश के लिए टीम इवेंट में राकेश, श्याम सुंदर स्वामी और तारिफ गोल्ड मेडल लेकर आए, लेकिन देख लीजिए उन्हें कोई नहीं जानता क्योंकि उन्हें जो मीडिया कवरेज मिलना चाहिए था वह उन्हें नहीं मिला। मीडिया कवरेज भले ही न मिला हो लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि हमारे आर्चर पैरा एशियन खेलों में बहुत ही अच्छा प्रदर्शन करके दिखाएंगे और देश के लिए मेडल लेकर आएंगे।”

सवाल 11. विज्ञापनों में भी देखा गया है कि कहीं भी पैरा एथलीट को जगह नहीं मिलती, इस पर आपकी क्या राय है?
जवाब. “रियो पैरा ओलम्पिक्स में देश के लिए चार खिलाड़ी मेडल लेकर आए लेकिन उन्हें विज्ञापन में काम करने का मौका नहीं दिया गया। अगर पैरा एथलीट्स को ज्यादा महत्व मिले या विज्ञापन मिले तो एक बहुत बड़ा बदलाव आ सकता है। हमारे देश में करीब 7 करोड़ दिव्यांग है। अगर देश के लिए मेडल लाने वाले एथलीट्स की पब्लिसिटी होती है तो उन अन्य दिव्यांग लोगों को भी जागरुक किया जा सकता है, जो कुछ करके दिखाने की अपनी आशा खो चुके हैं।”

सवाल 12. पैरा एशियन खेलों की आपकी कैसी तैयारी है?
जवाब. “पैरा एशियन खेलों के लिए हमारी बहुती ही अच्छी तैयारी है। फिलहाल हम महाराष्ट्र के औरंगाबाद के भारतीय खेल प्रधिकरण में हैं, जहां पर अच्छे से खिलाड़ियों को खेलों के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है। मुझे उम्मीद है कि आगामी खेलों में हम बहुत अच्छा प्रदर्शन करेंगे।”

सवाल 13. 2020 में होने वाले पैरालम्पिक खेलों के लिए आपका क्या टारगेट है?
जवाब. “आगामी पैरालम्पिक्स में हमारे सारे खिलाड़ी बहुत ही अच्छा प्रदर्शन करेंगे। सभी कोच और सभी खिलाड़ी अगले पैरालम्पिक्स की तैयारियों में जुटे हुए है और काफी मेहनत कर रहे हैं। इसके लिए खेल मंत्रालय का बहुत आभारी हूं कि वे समय पर कैंप लगाकर बच्चों को अच्छी सुविधाएं दे रहे हैं।”

सवाल 14. उन परिजनों को क्या संदेश देना चाहेंगे जो कि अपने बच्चों की खेल इच्छा देखने के बावजूद उन्हें सपोर्ट नहीं करते और केवल पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कहते हैं?
जवाब. “मैं ऐसे परिजनों को संदेश देना चाहता हूं कि वे ऐसा न सोचें क्योंकि खेलने से बच्चे का स्वास्थ्य और दिमाग दुरुस्त रहता है। मेरा तो मानना है कि जो बच्चे खेल से जुड़े रहते हैं वे पढ़ाई में भी काफी अच्छे होते हैं। मैं अपने खेल तीरंदाज़ी के बारे में बताना चाहूंगा कि यह खेल तो ऐसा है कि जिसमें एकाग्रता सीखने को मिलती है। परिजनों को कभी भी खेल को द्वितीय और शिक्षा को प्रथम नहीं समझना चाहिए। खेल और शिक्षा दोनों को एक साथ लेकर चलना चाहिए। बच्चों के लिए कहना चाहूंगा कि वे शिक्षा के समय अपना पूरा ध्यान अपनी शिक्षा पर लगाएं और जिस खेल में आपकी रुचि है उसे खेलते समय अपना पूरा ध्यान केवल उसमें लगाएं। इससे बच्चों का हेल्थ भी अच्छा रहेगा और उनका मनोबल भी बढ़ेगा।”

सवाल 15. आपको खेलों को लेकर कमी कहां नजर आती है?
जवाब. “मेरा मानना है कि खिलाड़ियों और सभी कोच को थोड़ा खुद में सुधार लाने की जरुरत है। सरकार द्वारा हमें हर प्रकार की सुविधाएं दी जा रही हैं। उन सुविधाओं का हम अच्छे से इस्तेमाल करें और एक अनुशासन बनाकर रखें। अगर अनुशासन के साथ अच्छे से खिलाड़ियों को ट्रेनिंग दी जाए तो वो दिन दूर नहीं जब ओलम्पिक में भारत के बहुत सारे मेडल्स आएंगे। जबतक अनुशासन नहीं होगा, अच्छे से ट्रेनिंग नहीं दी जाएगी तबतक मेडल नहीं आएंगे। कमी इसमें है कि कई एथलीट कैंप खत्म होने के बाद घर चले जाते हैं लेकिन वे घर जाकर अपनी खेल किट देखना तक पसंद नहीं करते। जबतक अच्छे से प्रैक्टिस नहीं होगी तबतक कैसे अच्छा प्रदर्शन करके खिलाड़ी मेडल लेकर आएंगे। कोच होने के नाते यह मेरी अपनी भावना है।”

सवाल 16. खेलों को लेकर आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
जवाब. “मैं सभी सरकारी व गैर-सरकारी कोच से मेरा निवेदन है कि वे खिलाड़ियों को अच्छे से ट्रेनिंग दें। परिजनों के साथ कोच मीटिंग करें और खेल के प्रति उनका भी मनोबल बढ़ाएं ताकि मेडल के मामले में हमारा देश को आगे बढ़ाया जा सके। 100 साल के ओलम्पिक इतिहास में हमारे केवल 28 मेडल हैं, जिन्हें बढ़ाना जरूरी है।”

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